चिराग के दांव से चित्त हुए नीतीश!

Uncategorized देश

विधान सभा चुनाव में लोजपा को एनडीए घटक दल के रूप में महज 15 सीट आफर करना क्या राजनैतिक भूल थी ?

बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में मानो सभी चीजें एक व्यक्ति के फ़ैसले के इर्दगिर्द घूमती रहीं। चुनाव परिणाम आने के पहले भी वही शख़्स चर्चा में रहा और अब परिणाम आ जाने के बाद भी चर्चा उसी व्यक्ति की हो रही है। अगर एलजेपी के नफा-नुकसान की बात करें तो पिछले चुनाव में बीजेपी के साथ रहकर भी मात्र 2 सीटों में उसे जीत मिली थी, और इस बार अकेले लड़ कर भी कुल एक सीट का नुक़सान हुआ, लेकिन उससे भी ज़्यादा चर्चा इस बात की है कि एनडीए के साथ ना रहने का नतीजा यह हुआ कि 42 सीटों पर नीतीश कुमार को मुँह की खानी पड़ी। और आज आंकड़े सभी के सामने हैं, बिहार में एनडीए की सरकार तो बनी पर बहुत छोटे अंतर से सरकार बनी है। इससे पहले कई प्रदेशों में जोड़-तोड़ कर सरकारें या तो गिराई गईं या बनाई गईं, अगर वही प्रयोग यहां दोहराए गए तो 5 वर्ष तक बिहार में वर्तमान सरकार चलेगी यह भी कहना मुश्किल है। दूसरी ओर एलजेपी ने सीधे तौर पर नीतीश कुमार को 36 सीटों की चोट पहुंचाई है, लोजपा ही है जिसके कारण सभी दलों के आँकड़े बदले हुए हैं। सर्व विदित है एलजेपी ने भाजपा को जानकारी देकर मात्र 6 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे। अगर एलजेपी भाजपा के ख़िलाफ़ और प्रत्याशी उतारती तो निश्चित ही बीजेपी की जीत का आंकड़ा कुछ और होता, कई सीटें घट सकती थीं लेकिन लोजपा प्रमुख चिराग पासवान नहीं चाहते थे, जो उन्होंने सीधे तौर पर सार्वजनिक मंच से भी कहा है। ऐसे में सवाल यह उठता है की लोजपा ने आखिर क्यों जेडीयू के ख़िलाफ़ सभी सीटों पर प्रत्याशी उतारे और बीजेपी के ख़िलाफ़ मात्र 6 प्रत्याशी ही मैदान में उतारे। इस बात को समझने के लिए एक महीना पहले यानी चुनाव की तारीख़ों के ऐलान के वख्त पर जाना होगा, उस समय लोजपा के पास तीन विकल्प थे। पहला यह कि एलजेपी बिहार में 6 लोकसभा और 1 राज्यसभा सांसद होने के बावजूद बिहार विधान सभा के लिए मात्र 15 सीटों का दिया गया ऑफर मान जाती, दूसरा वे एनडीए को पूरी तरह छोड़ कर महागठबंधन के साथ जाते या फिर तीसरा ऑप्शन जो उसने चुना फ़्रेंडली फ़ाइट का। लोजपा को यह टीस थी की जेडीयू नहीं चाहती थी कि लोजपा के खाते में ज़्यादा सीटें जाएं, यही कारण था जो लोजपा ने खास रणनीति के तहत जेडीयू के ख़िलाफ़ प्रत्याशी उतार दिये, नतीजा आज सबके सामने है, बिहार चुनाव में आये नतीजों में लोजपा की छाप साफ देखी जा सकती है। आज बिहार ही नहीं पूरे देश को यह पता है कि लोजपा के इस दांव का नतीजा यह हुआ है कि नीतीश के मुख्यमंत्री बनने के बावजूद उनकी राजनैतिक ज़मीन लोजपा ने कमजोर करदी है। इन आंकड़ों को देख कर यह अंदाजा लगाना आसान है कि लोजपा अब जिसके साथ भी रहेगी उसी की सरकार बनेगी। लोजपा संस्थापक राम विलास पासवान हमेशा कहते थे कि “लोजपा को आप इग्नोर नहीं कर सकते हैं” लोजपा ने 2020 के चुनाव में केवल अपना एक विधायक खोया, लेकिन लगभग 6 प्रतिशत और 24 लाख वोट उसकी झोली में गए। आज इस बात को दावे के साथ कहा जा सकता है कि आगामी 2024 और 2025 के चुनाव में बिहार का सिकंदर वही बनेगा जिसके साथ लोजपा होगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *