अरुणाचल प्रदेश की एक ऐसी जगह, जहां आज भी होती है हाथों से खेती..

प्रदेश

आज हमारा देश जहां एक ओर पानी की किल्लत से जूझ  रहा है तो वही दूसरी ओर इस जगह के लोग पानी की एक एक बूंद का हिसाब रखते हुये पानी का सही इस्तेमाल करके अपनी जगह को सुंदर बना रहे है। हम आज बात कर रहे है अरुणाचल प्रदेश में स्थित जीरो घाटी, जो दुनिया के कुछ उन मुट्ठीभर ठिकानों में से है, जहां आज भी प्रकृति और परंपराओं की जुगलबंदी कायम है। यहां हर घर की महिलाए समूह के रूप में खेतों पर काम करती है और बारी-बारी से एक-दूसरे के खेतों के काम में जाकर मदद भी करती है।

आज जहां लोग नई नई तकनीकी संसाधनों का उपयोग करके अपने काम को असान कर रहे है वही यहां के लोग अपनी ही किस्म‍ की सबसे अनूठी खेती कर लोगों को एक संदेश दे रहे है। यहां पर आज भी खेती में किसी पशु या मशीन की मदद नहीं ली जाती, बल्कि सारा काम सिर्फ महिलाएं अपने हाथों से करती हैं।

यहां पर पुरूषों से ज्यादा महिलाएं ही खेती करती हैं और वही परिवार की मुखिया भी होती हैं। यह वही अपातिनी जनजाति है, जिनकी महिलाएं काले नोज प्लग पहनती हैं और जिनके माथे से ठोढ़ी तक टैटू होते हैं।

पानी की बचत और हर बूंद का सही इस्तेमाल इनकी जीवनशैली का हिस्सा बन चुका है। इतना ही नहीं यहां नियम है कि साल में एक दिन हर व्यक्ति को नहर की देखरेख के लिए देना होगा। खेतों की इन नालीनुमा नहरों में मछली पालन भी हो रहा है।

मछलियां जो कुछ उगलती हैं वो खेतों में समाता रहता है, ऑर्गेनिक खाद बनकर। वैसे यहां खेती ऑर्गेनिक ही होती है। इसके लिए भी पूरी व्यवस्था बनी हुई है। मुर्गियों और सुअरों के बाड़ों से एकत्र अपशिष्ट का इस्तेमाल खेतों में होता है।

घरों में चूल्हों से निकली राख, तिनके-पत्तियां, डंठल, घरों में फलों-सब्जियों समेत अन्य ऑर्गेनिक कचरा कहीं और न जाकर खेतों में ही पहुंचाया जाता है। ऐसा सदियों से हाे रहा है। जीरो वैली के हॉन्ग, सिरो और ओल्ड जीरो गांव में इस खेती की परंपरा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़ा रहे हैं।

अपातिनियों की इस घाटी में करीब 48% भूमि पर धान की खेती और मछली पालन हो रहा है, जबकि आसपास का 33% इलाका जंगलों से ढंका है, 17% में बांस खड़े हैं, शेष 2% पर घर-घर में बाग-बगीचे हैं। कीवी, शहतूत, अलूचे जैसे फलाहारी वृक्षों से भरे-पूरे। यहां प्रति हेक्टेयर धान की उपज बाकी भागों की तुलना में 3 से 4 गुना ज्यादा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *