इस गांव में आजादी के बाद भी नही आई बिजली, तरस रहे है मूलभूत सुविधाओं के लिये

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उमरिया 4 जून – जिले की एक पंचायत आज भी ऐसी है जहां आजादी के 72 साल बाद भी ग्रामीण बिजली, पानी, अनाज और मजदूरी को तरस रहे हैं | शासन की सारी योजनाये कागजों में चल रही है | चाहे सरकार भाजपा की रही हो या कांग्रेस की सभी के सारे दावे ग्राम पंचायत बिछिया में खोखले साबित होते हैं | आदिवासियों के नाम पर जम कर बंदरबांट हो रहा है और आदिवासी आज भी नंगे भूखे हैं | सचिव और रोजगार सहायक हर काम के पैसे ग्रामीणों से वसूल कर घर बैठ जाते हैं और ग्रामीण अपनी किस्मत पर रोने को मजबूर हैं चुनाव के समय में सारे दलों के नेता बड़े – बड़े वादे करने के बाद दुबारा मुंह नहीं दिखाते हैं | जिले के कलेक्टर ने भी शिविर लगा कर समस्या हल करने को कह कर औपचारिकता पूरी कर दिया |

व्ही ओ 1 – आईये चलते हैं उमरिया जिले के करकेली जनपद अंतर्गत आने वाली पंचायत बिछिया का हाल देखें क्या है, सबसे पहले आपको बता दें ग्राम पंचायत बिछिया मैकल पर्वत श्रंखला पर बसा उमरिया जिले का आख़री गाँव है, ग्राम पंचायत मुख्यालय पंहुचने के लिए 5 किलोमीटर खडा पहाड़ चढ़ना पड़ता है और फिर 17 किलोमीटर आड़े – टेढ़े रास्ते से पहाड़ के ऊपर चलना पड़ता है | सबसे पहले चलते हैं ग्राम कलोरी यहाँ के बुजुर्ग डोमरी लाल, वार्ड नंबर 10 के पञ्च सोने लाल, छात्र प्रयाग, संपत लाल, सुग्गन बाई और सुदामा लाल बताये कि यहाँ न बिजली है और न ही पानी है, नाम मात्र को सी सी रोड तो बन गई है लेकिन बनते के साथ उखड भी गई है, यहाँ लोगों को सी सी रोड में काम करने के बाद 3 साल से मजदूरी भुगतान नहीं हुआ, वहीँ मेड बंधान की भी मजदूरी नहीं मिली, यहाँ बिजली न होने के कारण बच्चे पढ़ नहीं पाते हैं उचित मूल्य दुकान का विक्रेता नारायण सिंह महीने में एक दिन 2 घंटे के लिए दूकान खोलता है जिसको अनाज मिल गया वो ले लिए बाकी फिर नहीं मिलता है, यहाँ का रोजगार सहायक पंकज मिश्रा ग्रामीणों से राशन कार्ड बनवाने के 5 सौ से 1 हजार रुपये तक वसूलता है, पात्रता परची निकालना हो तो 5 सौ रुपये, आयुष्मान कार्ड बनवाने के लिए 50 रुपये और शासन की किसी भी योजना का लाभ लेना हो तो बिना पैसे के नहीं मिलता है, सबसे ख़ास बात तो यह है कि बुजुर्गों, विधवाओं को पेंशन भी नहीं मिलता है | प्रधान मंत्री आवास आज तक पूरा नहीं बन पाया, कागजों में प्रगति भी दिखा दी गई लेकिन वास्तविकता कुछ और है, इतना ही नही रोजगार सहायक पंकज मिश्रा पैसे लेने के बाद गांव का रास्ता ही भूल जाता है और भोले – भाले आदिवासी उसका रास्ता देखते रह जाते हैं | जिले का कोई भी अधिकारी इस पंचायत में जाना ही नहीं चाहता है, इंजीनियर भी घर बैठ कर एम बी रिकार्ड कर सी सी जारी कर देता है |

अब चलते हैं ग्राम पंचायत मुख्यालय बिछिया में वहां का  भी हाल देखें ग्रामीण किन समस्याओं से दो – चार हो रहे हैं, यहाँ भी पानी नहीं है दूर से लेकर आना पड़ता है सड़क के नाम पर वही लीपा – पोती कर दी गई है, ग्रामीणों के जाब कार्ड खाली पड़े हैं उसमें कोई इंट्री ही नहीं है यहाँ भी कुंआ पंचायत की तरफ से बनवाया गया है लेकिन पानी नहीं है मजदूरी भी 3 साल से नहीं मिली है | राधा बाई कहती है कि हमारे गाँव में न कुंआ, न तालाब और न पानी की व्यवस्था है पंचायत से कुंआ बनवाया गया है लेकिन मजदूरी नहीं मिली है, गांव के पञ्च कलेक्टर साहब के यहाँ शिकायत भी कर चुके हैं लेकिन कोई सुनवाई नहीं होती है, हम लोग इसके – उसके पैर पड रहे हैं कोई नहीं सुन रहा है, सेठ साहूकारों से कर्ज लेकर खा लिए हैं अब वो लोग भी मांग रहे हैं हम कहाँ पायें जो दें | ग्रामवासी तड़फ – तड़फ कर मर रहे हैं मजदूरी के लिए, पानी के लिए, बिजली के लिए हमारे यहाँ कोई चीज की व्यवस्था नही है, अब सरकार नहीं सुनती है तो हम लोग कलेक्टर साहब के यहाँ धरना रख देंगे चाहे कलेक्टर साहब हमको फांसी पर टंगा दे कुछ भी कर लें |

अब ज़रा सबसे अधिक समस्याग्रस्त गाँव महोबा दादर चलें वहां का क्या हाल है, यहाँ तो 90 साल की वृद्धा बटनिया बाई खाने को मोहताज है गाँव वालों के रहमोकरम पर ज़िंदा है यदि कोई एक टुकड़ा रोटी दे दिया तो खा ली नहीं तो बेचारी भूखे ही सो जाती है हाथ पैर फूले हुए हैं कोई देखने वाला नहीं है, 20 साल से विधवा महिला इंदीया बाई पेंशन को तरस रही है मजदूरी करके बच्चों को पाल रही है ऐसे कितने वृद्ध और विधवाएं गाँव में हैं किसी को पेंशन नहीं मिल रही है | रोजगार सहायक पंकज मिश्रा इनसे भी पैसे लेकर गायब है लेकिन न तो पेंशन बनवाया और न ही राशन कार्ड, अब फिर से 5 सौ रुपये की मांग कर रहा है |

अब ज़रा देखें स्वास्थ्य व्यवस्था की तरफ तो महोबा दादर में कोई जाने का  नाम ही नही लेता है बीमार आदमी कोमल सिंह बताता है कि हमारे यहाँ कोई नहीं आता है यहाँ से 30 किलोमीटर दूर ईलाज के लिए जाना पड़ता है नहीं तो डाक्टर आता है तो पैसे लेता है यदि पैसे नहीं है तो आदमी गाँव में ही मर जाता है | वहीँ कमलेश सिंह का कहना है कि 2016 में प्रधान मंत्री आवास स्वीकृत होने के बाद आज तक पूरा पैसा नहीं मिला शौचालय के नाम पर दूसरे का फोटो खींच कर दिखा दिया गया अभी लेबर पेमेंट नहीं हुआ, यहाँ भी रोजगार सहायक पंकज मिश्रा सभी से पैसे लेकर गायब हो गया और इन लोगों के पैसे निकाल कर खा गया एक बार ग्रामीण शिकायत किये तो पंचायत से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था लेकिन भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत से फिर से रोजगार सहायक के पद पर वापस आ गया |

अब ज़रा देखें महोबा दादर में शासन की योजनाओं का लाभ कैसे मिलता है, सबसे पहले तो पानी की तरफ देखें तो यहाँ शहडोल संसदीय क्षेत्र के पूर्व सांसद स्वर्गीय दलपत सिंह परस्ते अपने मद से पानी के लिए टैंकर तो दे दिए जो आज भी सफ़ेद हाथी की तरह खडा है, लेकिन किसी की प्यास नहीं बुझा पा रहा है | यहाँ के निवासी चैन सिंह, लीला बाई, शांति बाई, अमर सिंह, महेंद्र सिंह, 85 वर्षीय बुजुर्ग सहिबा सिंह, 70 वर्षीय बुजुर्ग छोटे सिंह का कहना है कि हम लोग 5 किलोमीटर दूर पहाड़ के नीचे पड़ेरा गाँव से पानी लाते हैं | लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग भी जम कर बन्दरबाँट कर आदिवासियों के नाम पर खूब बजट डकारा है पानी के नाम पर 15 बोर करवाए गए लेकिन कोई भी बोर 100 से 150 फिट से ज्यादा गहरे नहीं हुए और बजट 500 फिट का आहरण हुआ है, दो हैण्ड पम्प से पानी 5 से 6 घंटे में 2 बाल्टी निकलता है, ग्रामीण पानी के लिए आश लगाये महुआ के पेड़ के नीचे पूरा दिन और रात बिताते हैं, ग्रामीण कहते हैं की हम लोग गर्मियों के मौसम में अपने बच्चों की शादी पानी की कमी के कारण नहीं कर पाते गर्मियों के मौसम में ग्रामीण मजदूरी नहीं कर पाते हैं मात्र अपने को ज़िंदा रखने के लिए पानी ही ढोते रहते हैं | यहाँ उज्जवला योजना का लाभ किसी को नहीं मिला रोजगार सहायक लोगों से इसके नाम पर भी पैसे वसूल कर ले गया लेकिन लोगों को आज तक लाभ नहीं मिला हालांकि कागजों में जिला अव्वल है |  जिले में उचित मूल्य दुकानों से मिलने वाले खाद्यान की बात करें तो यहाँ का विक्रेता नारायण सिंह माह में एक दिन शाम को 5 बजे पंहुच कर दूकान खोलता है और 2 – 3 घंटे में बंद कर देता है जिसको अनाज मिल गया वो किस्मत वाला है नहीं तो फिर किसी को नहीं मिलता है और दूसरे माह में अनाज लेप्स हो जाता है जबकि नियमानुसार जो हितग्राही किसी कारणवस खाद्यान नहीं ले पाता है तो उसको दूसरे महीने में देने का प्रावधान है लेकिन विक्रेता उस अनाज की कालाबाजारी कर बेच देता है | बुजुर्ग और विधवा पेंशन के नाम पर ठगे जा रहे हैं | इस तरह यदि भ्रष्टाचार और कागजों में संचालित योजनाओं को देखना है तो उमरिया जिले के बिछिया पंचायत में देखें |

ये तो रहा बिछिया पंचायत का हाल अब ज़रा जिला प्रशासन की तरफ भी देखें क्या कहते हैं जिले का प्रशासनिक अधिकारी, मंगलवार को ग्रामीण जिला मुख्यालय में आकर जन सुनवाई में आवेदन देकर अपनी समस्याओं की गुहार लगाये थे तब जन सुनवाई में बैठे डिप्टी कलेक्टर एल के पाण्डेय ग्रामीणों को आश्वासन दिए थे कि 3 दिन के भीतर गाँव में शिविर लगा कर समस्याओं को हल किया जाएगा, और तत्काल सी ई ओ करकेली आर के मंडावी को फोन पर निर्देशित भी किये थे, लेकिन आज तक शिविर नहीं लगा वहीँ जब इस मामले को लेकर जिले के कलेक्टर स्वरोचिष सोमवंशी से बात किया गया तो उनके द्वारा कहा गया की आपके द्वारा मामला मेरे संज्ञान में लाया गया है मैं सी ई ओ जनपद पंचायत और अधिकारीयों को निर्देशित करता हूँ कि 3 दिन के भीतर वहां जन समस्या निवारण शिविर लगा कर ग्रामीणों की समस्या को हल किया जाएगा | जिले के कलेक्टर के कहने के बाद भी आज तक शिविर नहीं लगा और ग्रामीण आश लगाये बैठे हैं कि हमारी समस्या अब हल हो जायेगी | अब तो ऐसा लगता है कि शिविर लगाने का आश्वासन छलावा मात्र है |

गौरतलब है कि आदिवासियों की हितैषी बनने वाली केंद्र और प्रदेश की सरकारें और अधिकारी आदिवासियों को बजट डकारने का माध्यम मात्र बना लिए हैं, वहीँ नेता भी पांच साल में एक बार बीहड़ पहाड़ पर जाकर सारी समस्याओं को हल करने के दावे करके वापस ग्रामीणों को मुंह नहीं दिखाते हैं, बस गरीब भोले – भाले आदिवासी ग्रामीणों के साथ सभी छलावा करने में लगे हैं, और अधिकारी उनके नाम पर अपना घर भरने में लगे हैं ऐसे में क्या प्रदेश के मुखिया इस मामले के दोषियों के ऊपर कार्यवाई करेंगे |

 

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