मीडिया और बेहयाई!

देश
नरेंद्र त्रिपाठी….
#Me too बम सबसे पहले नाना पाटेकर पर फूटा लेकिन इसके बाद तो मानों #Me too की झड़ी सी लग गई, समाज के न जाने कितने सफेदपोश लोगों के दामन पर ऐसे अनगिनत दाग लगे होंगे, किसी की बहन बेटी या बहू को मौका पाते ही अपनी हैवानियत का शिकार बनाने वाले कभी ये नहीं महसूस करते हैं कि, जो बेटी अपने घर आंगन में किलकारियां भरती है, उछल कूद मचा कर घर आंगन को खुशहाल बनाती है, लेकिन दहलीज़ से कदम बाहर रखते ही लोगों की निगाहें जिस तरह से उसके बदन को एक्सरे की तरह स्कैन करती हैं तो वो घर की लाडली कितना अपसेट या अटपटा महसूस करती होगी, ये तनिक भी ऐसे लोगों को महसूस नहीं होता है क्या। कि जिस तरह से उनकी बेटी उनकी लाड़ली है वो भी किसी की लाड़ली होगी, उसके आगे जब वो किसी मीडिया संस्थान में नौकरी के लिए जाती है तो संस्थान के तथाकथित आका की निगाह हमेशा उसके ऊपर बनी रहती है अगर वो उनकी इशारों पर चली तो वो सुपर बॉस बन जाती है लेकिन अगर उसने विरोध किया तो कभी कभी तो उसका जीना भी मुहाल हो जाता है, मजबूरन उसे अपने भविष्य की चिता, और किसी किसी पर तो ज़िम्मेदारियों का बोझ ऐसा होता है कि वो हर ज़्यादती सह कर भी मुह बंद रखती है, एमजे अकबर पर जिस तरह के गंभीर आरोप लगे हैं वो शर्म से चिल्लू भर पानी में डूब मारने वाली बात है, लेकिन बेहयाई से जिस तरह से उन्होंने न सिर्फ जवाब दिया बल्कि पीड़ित पर ही आरोप मढ़ दिया। खबर नबीसों से हट कर जो समाज में मीडिया को चौथा स्तम्भ मानते हैं उनको अगर मीडिया के भीतरखाने की सच्चाई पता चले तो उन्हें कथित समाज के चौथे स्तम्भ पर जो अटूट भरोसा है वो चकनाचूर हो जाएगा। आज भी वक्त है मीडिया वाले अगर अब भी नहीं चेते तो परिणाम बुरा होगा।

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