देश की पहली महिला विधायक डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी

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हमारे समाज में महिलाओं के स्थान की बात करें. तो हजारों सालों से उनका स्थान पुरानी रूढ़ियों में बांधकर रखने वाला था। जिनकी बंदिशों में रहकर उन्हें अपना जीवन गुजारना पड़ता था। समय चाहें जो भी उन्हें हर समय अपने अधिकारों के लिये हमेशा संघर्ष ही करना पड़ा है। इन्ही पुरानी रूढ़ियों के बीच संघर्षों की लड़ाई लड़कर उभरी एक ऐसी महिला जिसनें सभी लोगों के जुल्मों को सहकर अपनी एक खास जगह बनाई। ओर महिलाओं के लिये बहुत बड़ी प्रेरणा बना। हर महिलाओं के लिये उन्होनें एक सीख दी।

आज हम बात कर रहे है भारत की पहली महिला विधायक बनी मुथुलक्ष्मी रेड्डी की। जो अपने जीवन की असली नायिका थी। इसके साथ कॉलेज में डॉक्टरी की पढ़ाई करने वाली पहली महिला छात्र भी डॉ. रेड्डी ही थीं।

इन्होनें अपना पूरा जीवन लोगों के अच्छे स्वास्थ के लिये समर्पित कर दिया। इसके साथ ही इन्होनें महिलाओं के जीवन को बेहतर बनाने के लिये लंबी लड़ाई लड़ी। उनमें से एक थी। लोग उन्हें एक शिक्षक, समाज सुधारक, सर्जन और व्यवस्थापक के तौर पर याद करते हैं। इन्हें पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। चलिये आज हम दोस्तों परिवार और बच्चों के साथ उनकी यादों को साझा करते हैं

कम उम्र में शादी

डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी का जन्म 30 जुलाई, सन् 1883 को तमिलनाडु के पुडुकोट्टई में हुआ। पुरानी रूढ़िवादी विचारधारा होने के कारण उनके माता-पिता उनकी शादी काफी छोटी उम्र में ही कर देना चाहते थे, लेकिन डॉ. रेड्डी ने इसका विरोध करते हुए पढ़ाई पूरी करने की बात कही। और सके लिये उन्होनें अपने परिवार को मना ही लिया। शुरुआती शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए मद्रास मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया। इस कॉलेज में डॉक्टरी की पढ़ाई करने वाली यह पहली महिला छात्र भी डॉ. रेड्डी ही थीं। यही वह कॉलेज था जहां उनकी दोस्ती एनी बेसेंट और सरोजिनी नायडू से हुई।

 राजनीति में प्रवेश

कुछ ही सालों में डॉ. रेड्डी ने मेडिकल करियर को छोड़ राजनीति का रुख किया। मद्रास विधानसभा की पहली महिला सदस्य बनने के बाद उन्होंने कम आयु में लड़कियों की शादी रोकने उनकी शिक्षा के लिए उन्हें बाहर निकालने के लिये कठोर कदम उठाये। और कई नियम पारित किये। साथ ही उन्होंने समाज में महिलाओं के शोषण के खिलाफ भी अपनी आवाज को बुलंद किया।

कैंसर पीड़ितों का इलाज

डॉ. रेड्डी को अपनी बहन की कैंसर से हुई मृत्यु का गहरा सदमा लगा था। इसके बाद उन्होंने साल 1954 में चेन्नै में अद्यार कैंसर इंस्टिट्यूट की शुरुआत की। यह कैंसर अस्पताल अभी भी दुनिया के सबसे सम्मानित कैंसर अस्पतालों में से एक है। यहां हर साल 80,000 से ज्यादा कैंसर पीड़ितों का इलाज किया जाता है।

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